अंग्रेज अधिकारियों ने शुरू की सिर पर मैला ढोने की प्रथा?

अंग्रेज अधिकारी अपने देश में कैसा भी जीवन गुजार रहे हों लेकिन जब वह भारत आते थे तो पूरे राजसी ठाट-बाट से रहते थे और उनकी जरूरतें पूरी करने के लिए जिस वर्ग का शोषण होता था वह शूद्र वर्ग था.

अंग्रेज अधिकारियों ने शुरू की सिर पर मैला ढोने की प्रथा?
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सिर पर मैला ढोने की प्रथा के बारे में कहा जाता है कि, ये प्रथा भारतीयों की देन थी लेकिन ये आधा सच है. आइये एक बार हम इसका विश्लेषण करते हैं कैसे इस प्रथा ने भारत में अपने पाँव पसारे.

क्रिकेट अकेली ऐसी चीज नहीं है जिसे अंग्रेज भारत ले आये और वह इंग्लैंड से भी ज्यादा भारत में पॉपुलर हो गया. भारत में आज भी कई प्रकार की कुप्रथाएं मौजूद हैं जिनका जन्म यूरोप में हुआ लेकिन ब्रिटिश शासन काल में उसे अंग्रेज भारत ले आये. उन्हीं कुप्रथाओं में से एक है सिर पर मैला ढोने की प्रथा.

क्या घर में शौच करते थे भारतीय

शहरों के उदय एवं घर-घर शौचालय से पहले भारत में आमतौर पर लोग मल त्याग करने के लिए खेतों में जाया करते थे.  सिर पर मैला ढोने की आवश्यकता तभी होती है जब कोई परिवार घर के अंदर मलत्याग करे.

आज भारत में घर-घर अवश्य शौचालय बन गये हैं लेकिन थोड़ा पीछे जाएँ तो भारतीय जनमानस उस घर मे जहां वो रहता था और जिस घर में खाना बनता था वहां मलत्याग करना कभी नहीं पसंद करता था.

ये अवश्य है कि छोटे बच्चे जब घर में मल त्याग करते थे तो उन्हें फेंकने के लिए बाहर जाना पड़ता था और आज भी उन गांवों में ऐसा ही है जहां घर में शौचालय नहीं है.

इस प्रकार के मल फेंकने के लिए सामान्य घरों में घर के सदस्य ही जाया करते थे लेकिन अमीर घरों में ये कार्य घर के सदस्यों के बजाय उनके यहाँ नौकरी करने वाले परिवार करते थे.

सिर पर मैला ढोने की प्रथा में ब्रिटिश अधिकारियों की भूमिका

लेकिन ब्रिटिश शासन द्वारा थोपी गयी शिक्षा प्रणाली के माध्यम से भारत में दुष्प्रचार चला कि, भारत में लोग शूद्रों को सिर पर मैला ढोने को मजबूर करते थे. असल में सिर पर मैला ढोने की प्रथा को सबसे ज्यादा बढ़ावा ब्रिटिश अधिकारियों ने दिया.

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घर के अंदर मलत्याग की आदत यूरोप के उच्च घरानों से निकली थी. यूरोप में अभिजात्य वर्ग के लोग इस्पात से बने पात्रों में मल त्याग करते थे जिन्हें उनके कर्मचारी साफ करने और फेंकने का काम करते थे.

अंग्रेज अधिकारी जब भारत आये तो तब शौच क्रिया के लिए उन्होंने वही उपाय निकाला था जो यूरोप का अभिजात्य वर्ग करता था. अंग्रेज अधिकारी और उनके परिवार इस्पात से बने पात्रों में ही मल-त्याग करते थे जिसे साफ़ करने और ढोने का कार्य उनके भारतीय कर्मचारी करते थे.

अंग्रेज अधिकारी अपने देश में कैसा भी जीवन गुजार रहे हों लेकिन जब वह भारत आते थे तो पूरे राजसी ठाट-बाट से रहते थे और उनकी जरूरतें पूरी करने के लिए जिस वर्ग का शोषण होता था वह शूद्र वर्ग था.

अंग्रेज अधिकारियों के घर में काम करने वाले भारतीय कर्मचारियों को साथ गुलामों जैसा व्यवहार होता था जिन्हें हर वह कार्य करने के लिए मजबूर किया जाता था जिन्हें भारतीय समाज में घृणित समझा जाता था.

दीवान जरमनी दास के यात्रा वृतांत

अगर हम ऐतिहासिक प्रमाण देखें तब वो भी इसी ओर इशारा करते हैं. कपूरथला रियासत के दीवान रहे जरमनी दास ने कई देशों के राजघरानों की यात्रायें की थी. उन्होंने भारत एवं यूरोप के रजवाड़ों के जीवन पर दो किताबें “महाराजा” एवं “महारानी”  लिखी हैं.

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ऐसे ही यूरोपीय रजवाड़ों पर लिखे गए अपने एक यात्रा वृत्तांत में उन्होंने लिखा है कि, कैसे यूरोप के राजा-रानियाँ और उच्च पदों पर बैठे लोग महल के अंदर ही कहीं भी मल त्याग कर दया करते थे जिसे फेंकने का काम उनके कर्मचारी किया करते थे.

ऐसे कई सारे प्रमाण मिलते हैं जो इस ओर इशारा करते हैं कि सिर पर मैला ढोने की प्रथा भारत में यूरोपीय शासक एवं अधिकारी अपने साथ लेकर आये थे.

वर्तमान स्थिति

सिर पर मैला ढोने की प्रथा पर क़ानूनी रूप से भारत में प्रतिबंध है लेकिन मीडिया रिपोर्टों की माने तो देश के कुछ हिस्सों में गाहे-बगाहे यह अभी भी देखने को मिल जाती है.

भारत में ऐसी कई सामाजिक बुराइयां हैं जिनसे हमें छुटकारा पाने की आवश्यकता है लेकिन भारत के इतिहास को नीचा दिखाने के लिए गढ़े गए Narratives को देश के सामने लाना भी हमारा कर्तव्य है.

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