म्यांमार में तख्तापलट के पीछे किसका हाथ?

म्यांमार में तख्तापलट का चीन ने जिस तरह यूनाइटेड नेशन जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंच पर बचाव किया और उसकी निंदा से दूरी बनाये रखी, उसने म्यांमार के प्रदर्शनकारियों को चीन के खिलाफ भड़का दिया है.

म्यांमार में तख्तापलट: क्या चीन के सहयोग से सेना ने कब्जाई सत्ता?
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म्यांमार में तख्तापलट का मुद्दा गर्माता जा रहा है. म्यांमार के शहरों में बड़ी आबादी तख्तापलट को लेकर सड़कों पर है. कई हिस्सों में प्रदर्शन बेहद हिंसक है. लोकतंत्र बहाली को अभी म्यांमार में ज्यादा दिन नहीं बीते थे जब आंग सान सू की ने सत्ता में वापसी की थी. लेकिन अब वह पुनः नजरबंदी में हैं.

एक बार पुनः म्यांमार की सत्ता पर सेना की वापसी हुयी है जिसने सू की पर गंभीर आरोप लगाये हैं. फ़िलहाल इस बात को लेकर मंथन चल रहा कि, म्यांमार के तख्तापलट के पीछे कौन सी शक्तियाँ हैं?

म्यांमार में जो हो रहा है पश्चिमी देशों द्वारा इसका आरोप पड़ोसी देश चीन पर लगाया जा रहा है. म्यांमार में जो प्रदर्शन चल रहे हैं उसमें भी प्रदर्शनकारियों ने चीनी निवेश को निशाना बनाया है.

चीनी कारखानों पर प्रदर्शनकारियों के हमले

म्यांमार में प्रदर्शनकारियों के द्वारा चीनी कंपनियों के कारखाने बड़े पैमाने पर तो नष्ट किये ही जा रहे हैं साथ ही चीनी सहयोग से जिन कारखानों की स्थापना की गयी थी उनमें भी आग लगाई जा रही है.

म्यांमार में तख्तापलट का चीन ने जिस तरह यूनाइटेड नेशन जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंच पर बचाव किया और उसकी निंदा से दूरी बनाये रखी, उसने म्यांमार के प्रदर्शनकारियों को चीन के खिलाफ भड़का दिया है.

म्यांमार में लोकतंत्र बहाली के पीछे अमेरिका और पश्चिमी देशों की बड़ी भूमिका थी. यही कारण है कि, म्यांमार में तख्तापलट के बाद G-7 समूह ने एक सुर में तख्तापलट की निंदा की है और पुनः लोकतंत्र वापसी के लिए म्यांमार के सैनिक शासन पर दबाव बनाना शुरू कर दिया हैं.

म्यांमार में तख्तापलट के पीछे सेना का तर्क

म्यांमार में तख्तापलट को लेकर फ़िलहाल सेना ने जो कारण गिनाये हैं उनमें चुनावों में धांधली से लेकर आंग सान सू की द्वारा म्यांमार के राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन शामिल है.

हालाँकि सू की के समर्थकों ने इन सभी आरोपों को निराधार बताया है. सू की एवं उनके मंत्रालय से जुड़े लोगों को कैद कर सेना ने एक वर्ष का आपातकाल लगा दिया है.

चीन पर क्यों लग रहे आरोप?

म्यांमार चीन का एक प्रमुख पड़ोसी देश है जिससे उसके कई महत्त्वपूर्ण मामलों में करीबी संबंध हैं. म्यांमार से करीबी संबंध रखना ना ही मात्र कूटनीतिक रूप से चीन के लिए लाभदायक है बल्कि आर्थिक रूप से भी यह बेहद फायदे का सौदा है.

म्यांमार में चीनी कंपनियों ने अरबों रूपये का निवेश किया हुआ है और ये बेहद तेज गति से आगे बढ़ रहा है. ऐसे में म्यांमार का पड़ोसी होने के नाते चीन कभी नहीं चाहेगा कि, वहां एक ऐसा शासन हो जिसका नेतृत्व पश्चिमी देशों का समर्थक हो.

चीन की अमेरिका और पश्चिमी देशों से जो व्यापारिक दुश्मनी चल रही हैं उसमें म्यांमार जैसे एशियाई देश महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं. म्यांमार ना ही मात्र चीन का करीबी पड़ोसी है बल्कि वहां चीनी शहरों के अपेक्षाकृत लेबर भी सस्ती है.

अगर म्यांमार में चीन की पकड़ मजबूत रही तो निकट भविष्य में वह अपने और भी कारखानों का विस्तार म्यांमार के प्रमुख शहरों में कर सकता है. अपने देश में गहराते वायु प्रदूषण और महंगी होती मजदूरी जैसे बहुत से कारण है जो चीन को म्यांमार जैसे देशों की तरफ आकर्षित कर रहे हैं.

सस्ती लेबर के लिए जिस तरह अमेरिका ने किसी समय चीन जैसे देशों को फैक्ट्री के रूप में इस्तेमाल किया था अब वही भविष्य चीन का है. चीनी कंपनियां ऐसे देशों में अपनी फैक्ट्री बढ़ा रही हैं जहाँ की लेबर चीन से भी सस्ती हो.

चीन के इस कदम से म्यांमार जैसे देशों को अपने आर्थिक विकास में मदद तो मिलेगी लेकिन चीन का दबदबा भी बढ़ेगा. जरूरतमंद देशों को लोन देकर उनके महत्त्वपूर्ण संसाधनों को कब्जाने की चीनी नीति ऐसे देशों में भी लागू होती है.

म्यांमार में तख्तापलट का इतिहास

म्यांमार में तख्तापलट कोई नयी घटना नहीं है. इससे पहले 1962 में सेना समर्थित समूहों ने म्यांमार में सत्ता कब्जा ली थी जिनका शासन 2010 तक चला. सेना के इस लंबे शासन का ही परिणाम है उसे पुनः अपना इतिहास दोहराने में कोई समस्या नहीं हुयी.

म्यांमार की सेना के इतिहास को देखते हुए ही फ़िलहाल अबतक किसी भी देश ने प्रत्यक्ष तौर पर किसी भी विश्व महाशक्ति का नाम नहीं लिया है.

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