कैसे गढ़ा गया भारत पर अरब देशों के हमले का झूठ

इतिहास की किताबों में भरी बकवास से अगर बाहर निकलकर देखें तो वास्तविकता यह थी कि, भारत पर किसी विदेशी शक्ति का सीधे तौर पर हमला करना लगभग असंभव था. भारत पर लगभग 90 वर्ष राज करने वाले ब्रिटेन ने भी कभी भारत से युद्ध नहीं किया.

कैसे गढ़ा गया भारत पर अरब देशों के हमले का झूठ

भारत का इतिहास एडवेंचरस घटनाओं से भरा पड़ा है. कुछ एडवेंचर ऐसे भी हैं जिसकी परिकल्पना अच्छे-अच्छे फिल्म निर्देशक भी नहीं कर पाते. भारतीय इतिहास की किताबों में एक ऐसा ही एडवेंचरस हिस्सा है अरब देशों के भारत पर हमले का.

जर्मन मूल के British Propagandist फ्रेडरिक मैक्समूलर ने कहा था, “भारत पर हमने एक बार विजय प्राप्त कर ली है, लेकिन हमें एक बार और भारत पर विजय पानी होगी, और इस बार यह शिक्षा के द्वारा होगी.”

ये देखना दुर्भाग्यपूर्ण है कि, मैक्समूलर और ब्रिटेन ना ही मात्र अपने मिशन में सफल हए बल्कि उन्होंने जो फसल बोई उससे उपजे दिमाग उनका Propaganda फ़ैलाने में उनसे भी दस कदम आगे हैं.


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मैक्समूलर वही आदमी था जिसने भारतीय शास्त्रों का गलत अनुवाद किया था और बाद में उसने यह स्वीकार भी किया था कि, ये सब उसने अपने British Masters के कहने पर किया था. भारतीय इतिहास से छेड़छाड़ करने के लिए ब्रिटेन और उसके Paid Scholars ने जो काम किये थे उन पर से आजतक पर्दा नहीं उठाया गया.

आज हम इतिहास की किताबों में जो कुछ भी पढ़ते हैं उसमें उतना ही सच है जितना किसी फिल्मी कहानी में होता है. बल्कि अगर तर्क की कसौटी पर परखें तो फ़िल्में हमें ज्यादा वास्तविक लगेंगी बजाय कि इतिहास की किताबों के. भारतीय इतिहास की किताबों में आपको वह सबकुछ मिलेगा जैसा आप किसी रोमांटिक और एडवेंचरस फिल्म से आशा करते हैं.

भारतीय इतिहास पर आज भी जब कुछ लिखा जाता है या शोध किया जाता है तब स्रोत वही होते हैं जो ब्रिटेन और उसके Paid Masters ने प्लांट किये थे. यही कारण है कि, भारतीय इतिहास की किताबें जो पहले ही बेसिर पैर के तथ्यों से भरी हुयी थीं अब वह और ज्यादा गप्पों से परिपूर्ण हो गयी हैं.

ऐसी ही एक गप है भारत पर अरब देशों के हमले की. वही अरब देश जो पेट्रोल मिलने से पहले खाने और पानी को मोहताज थे और जनजातीय (Tribal) संघर्षों में ऐसे बंटे हुए थे कि, एक कबीले का आदमी अगर किसी दूसरे कबीले के क्षेत्र में दिख जाता था या उसके कुएं से पानी पी लेता था तो उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ता था.

अरब जगत में कबीलाई संघर्ष एक भयानक समस्या थी जिसके चलते अरब जगत पर सदियों तक (1517 से 1918 तक) तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य का राज रहा. उससे पहले अरब पर कई सदी तक इजिप्ट के ममलूक वंश ने शासन किया. यहाँ तक मक्का-मदीना भी ज्यादातर समय बाहरी साम्राज्यों के ही कब्जे में रहे.


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अरब के जो कबीले आपसी संघर्ष से कभी आगे नहीं बढ़ पाए और लंबे समय तक उन पर दूसरे साम्राज्यों ने शासन किया उन्होंने भारत जैसे देश पर हमला किया था या राज किया था ये सोचना भी अपने आप में एक मजाक है. अगर आज अरबों से पूछा जाय कि, उनके कौन से पुरखे भारत पर हमला करने आये थे तो शायद वो भी पेट पकड़कर हँसेंगे.

इतिहास की किताबों में भरी बकवास से अगर बाहर निकलकर देखें तो वास्तविकता यह थी कि, भारत पर किसी विदेशी शक्ति का सीधे तौर पर हमला करना लगभग असंभव था. भारत पर लगभग 90 वर्ष राज करने वाले ब्रिटेन ने भी कभी अकेले भारत से युद्ध नहीं किया बल्कि भारतीयों को भारतीयों से ही लड़वाकर राज चलाया था.

अरब ने भारत पर कितनी बार हमला किया होगा और कितनी बार विजय पायी होगी हमें ये जानने के लिए ज्यादा गड़े मुर्दे उखाड़ने की आवश्यकता नहीं है बल्कि पिछले कुछ दशकों के घटनाक्रम पर नजर डालकर हम भारत पर विदेशी आक्रमणों के इतिहास के बारे में समझ सकते हैं. इस दृष्टि से 18वीं और 19वीं सदी में घटे कुछ Geopolitical घटनाक्रम विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं.

1947 में भारत बंटवारे से पूर्व तक रूस भारत का पड़ोसी हुआ करता था. यूरोपीय देशों ने दुनिया भर में व्यापार के बहाने जब घूम-घूम कर देश कब्जाने शुरू किये तब इसमें सिर्फ ब्रिटेन ही नहीं पुर्तगाल, स्पेन, फ़्रांस, नीदरलैंड, जर्मनी, इटली और बेल्जियम जैसे कई खिलाड़ी थे. जिनमें कई बार आपस में भी युद्ध होते रहते थे.

कैसे गढ़ा गया भारत पर अरब देशों के हमले का झूठदुनिया का सबसे संपन्न देश होने के चलते उस समय भारत पर ना ही मात्र ब्रिटेन की बल्कि, पुर्तगाल और फ्रांस की भी नजर थी. हालांकि ब्रिटेन जितनी सफलता किसी को नहीं मिली. जहाँ पुर्तगाल के कब्जे में गोवा और दमन-दीव जैसे क्षेत्र आये वहीं फ्रांस के कब्जे में पांडिचेरी ही आया.

ब्रिटेन द्वारा भारत के व्यापार पर एकाधिकार कर लेने के बाद से ही फ्रांस की नजरें भारत पर थीं और वह किसी भी सूरत में भारत में वही स्थान चाहता था जो ब्रिटेन का था.


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फ्रांस ने अपने इस मिशन के लिए रूस का साथ लेना उचित समझा जिसकी ब्रिटेन से पुरानी दुश्मनी थी. रूस और ब्रिटेन के बीच चले इस खेल को पश्चिमी इतिहासकार “द ग्रेट गेम” का नाम देते हैं.

1801 में फ़्रांस के तात्कालीन शासक नेपोलियन बोनापार्ट ने रूस के जार पाल के साथ भारत पर आक्रमण करने का प्लान बनाया था. उस समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में स्थानीय राजाओं के साथ संधि करके व्यापार कर रही थी.

जब नेपोलियन और रूसी जार के मिशन की जानकारी रूस में ब्रिटिश जासूस चार्ल्स व्हिटवर्थ को लगी तब उसने अपने जासूसों और रुसी साम्राज्य के असंतुष्ट समूहों द्वारा जार पाल की सेंट पीटर्सबर्ग में हत्या करवा दी. जार पाल की हत्या के वैसे कई कारण गिनाए जाते हैं जिनमें से यह एक था.

जार पाल की हत्या के बाद नेपोलियन ने उसके बेटे जार एलेक्जेंडर को भारत पर आक्रमण करने के लिए तैयार करना शुरू किया जिसके लिए एलेक्जेंडर ने नेपोलियन को साफ़ मना कर दिया जिसके दो प्रमुख कारण थे:

  • पहला भारत की भौगोलिक परिस्थिति जिसके चलते भारत में घुसकर जमीनी युद्ध छेड़ना लगभग असंभव था
  • दूसरा युद्ध कौशल में भारतीयों का पारंगत होना, जिसके चलते उनसे लड़ना आत्महत्या करने जैसा था

आपने अगर इतिहास की किताबों में पढ़ा है कि, भारत पर अरब, फारसी, तातार, उज्बेक या मंगोल कभी हमला करने आये थे तो आपको थोड़ा दिमाग दौड़ाने की आवश्यकता है और साथ में भारत के भूगोल का भी अध्ययन करना होगा.


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तकनीकि, कला और संपन्नता का प्रतीक माना जाने वाला ताकतवर रूस भारत का पड़ोसी होते हुए भी कभी भारत पर आक्रमण नहीं कर पाया लेकिन ब्रिटिशों की लिखी किताबों में पढ़ाया गया कि, हजारों किलोमीटर दूर से आने वाले तुर्क अरबियों ने भारत को युद्ध में हराया और भारत पर राज किया.

ब्रिटेन ने भारत में और दुनिया पर जो राज किया वो अपने बलबूते नहीं किया बल्कि भारतीयों के ही बलबूते किया, ब्रिटेन से अंग्रेज सिर्फ कुछ हजार आये थे पूरा ब्रिटेन नहीं, भारत पर राज करने के लिए ब्रिटेन जिन सैनिकों का प्रयोग करता था वो भारत से ही होते थे, सिर्फ अधिकारी अंग्रेज होते थे.

अफ़्रीका में युद्ध लड़ना हो या इजराइल-फिलिस्तीन में, प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में लगभग हर मोर्चे पर ब्रिटेन ने भारतीय सैनिकों का इस्तेमाल किया और विजयी भी रहे. कई बार भारतीयों ने ब्रिटेन की सेना का नेतृत्व भी किया, उदाहरणस्वरूप बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह जो ब्रिटिश इम्पीरियल वॉर कैबिनेट के चीफ भी रहे थे.

आपको ये समझने की जरूरत है कि,

  • जिस राष्ट्र में युद्ध कौशल पाठ्यक्रम का हिस्सा हो
  • जिनके सैनिक दुनिया भर में जहां भी गये और जीतकर आये हों
  • जिस देश में विधवा औरतें (लक्ष्मीबाई और रानी चेन्नमा) झुकने के बजाय तलवार निकाल लेती हों
  • जिस देश के लोग मात्र इसलिए विद्रोह कर देते हों कि कारतूस में गाय की चर्बी क्यों लगाई है (1857)

अगर आपको लगता है कि, ऐसे राष्ट्र पर किसी विदेशी शक्ति ने हजारों वर्ष राज किया था तो ये महज मानसिक गुलामी है जो किताबों और विद्यालयों द्वारा हमारे दिमाग में ठूंसी गयी है.

मैक्समूलर का सपना खुद भारतीयों ने पूरा किया

मैक्समूलर और ब्रिटेन जो चाहते हैं उनके मिशन को भारतीयों ने बखूबी पूरा किया और एक ऐसा हारा हुआ इतिहास ढो रहे जो एक गप से ज्यादा कुछ नहीं था.

भारत में इतिहासकार का दर्जा प्राप्त मानसिक विकलांग ये सोचने में असमर्थ हैं कि, 57 मुस्लिम देशों में से किसी भी देश के पास आज आधुनिक जमाने में भी खुद की ढंग की सेना तक नहीं है फिर कैसे इतिहास में इन्होने भारत जैसे विशाल देश पर राज कर लिया.


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आज इस्लामिक देशों पर आये दिन कभी अमेरिका हमला करता है तो कभी ब्रिटेन. इस्लामिक राष्ट्रों में कोई भी ऐसा मुल्क नहीं है जो अमेरिका या ब्रिटेन का मुकाबला कर सके. ये देश खुद में ही इतना बंटे हुए हैं कि अगर उन्हें मौका मिले तो एक-दूसरे को ही ख़त्म कर दें. राजगद्दी के लिए सबसे ज्यादा आपसी कत्लेआम आज भी अरब देशों में ही देखने को मिलता है.

जबकि भारत के तथाकथित इतिहासकारों ने आपस में बंटे होने का आरोप मढ़ा भारतीयों पर. उनकी नजर कभी अरब देशों या यूरोपीय देशों की आपसी शत्रुता पर नहीं गयी. ब्रिटिशों द्वारा भारतीयों पर किये गए अत्याचारों और लाखों लोगों के नरसंहारों को भी ढकने का काम भी बखूबी इन इतिहासकारों ने ही किया.

अमेरिका की सुरक्षा में सांस लेने वाले अरब देशों की ताकत का सच

अरब देशों ने पेट्रोल मिलने के बाद से अवश्य ही आर्थिक प्रगति की है और आज दुनिया के सबसे संपन्न लोगों में से हैं लेकिन बात जब Internal या Security या Threats की आती है तो हम पाते हैं कि, आज भी पूरा अरब जगत अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्रांस के रहमोकरम पर जिंदा है.


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अगर अमेरिका मात्र एक साल के लिए अरब देशों के ऊपर से अपना हाथ हटा ले तो कुछ ही महीनों में अरब आंतरिक युद्ध में ही खंडहर बन जायेगा. 1979 में मक्का मस्जिद में जब सऊदी के कुछ विद्रोहियों ने कब्जा कर लिया तो मस्जिद को मुक्त कराने के लिए भी फ्रांस की सहायता ली गयी थी.

फर्जी इतिहास का बोझ ढो रहे भारतीयों को आज अपना इतिहास सुधारने की जरूरत है. भारतीय इतिहास को आज पुनः लिखे जाने की एवं भारतीयों को सही शिक्षा का महत्त्व बताने की जरूरत है. आगे के लेखों में हम इतिहास के ऐसे ही झूठे Narratives का खंडन करेंगे जो भारतीय जनमानस को हीनभावना से ग्रस्त बनाने के लिए लिखे गये थे.

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