क्या भारतीय इतिहास पूरी तरह से झूठ पर टिका है?

गैर-यूरोपीय सभ्यताओं को कमतर दिखाने के लिए European Propagandist ने 5000 वर्षों में ही भारत एवं दुनिया का पूरा इतिहास समेट दिया. इन सबमें सबसे हास्यास्पद काल निर्धारण है भारत के वैदिक काल का जिसे कुछ सदियों में समेटकर उसका किस्सा ख़त्म कर दिया गया है.

क्या भारतीय इतिहास पूरी तरह से झूठ पर टिका है?
Image Source Wavy Tales

भारतीयों को लगता है कि, उनके इतिहास में कई सारे झूठ हैं जिन्हें सुधारने की आवश्यकता है. लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज्यादा कड़वी है. अगर कहा जाय कि, पूरा भारतीय इतिहास ही ब्रिटिश राज के दौरान रचे गए झूठ पर टिका है तो शायद आपको शॉक लगेगा.

इतिहास के जो झूठे तथ्यों पर अक्सर चर्चा होती है लेकिन उनको अगर साइड में भी रख दें तो काल निर्धारण जैसी कई हास्यास्पद चीजें हैं जो पूरे भारतीय इतिहास को झूठा साबित कर देती हैं. इतिहास की पांच हजार साल वाली कहानियां आपने भी काफी सुनी होंगी. लेकिन क्या भारत का इतिहास बस पांच हजार साल पुराना है?


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भारतीय इतिहास का काल निर्धारण उसी आधार पर किया गया जैसी काल गणना यूरोपीय देशों में चलती है. यूरोप की तरह 5000 वर्षों में ही भारत का पूरा इतिहास समेट दिया गया है. इन सबमें सबसे हास्यास्पद काल निर्धारण है वैदिक काल का जिसे कुछ सदियों में समेट दिया गया है.

उसका कारण है इस देश का इतिहास यहाँ के अपने लोगों के बजाय उन लोगों ने लिखा जिनकी मंशा भारत को लूटने और शैक्षिक रूप से इस महान राष्ट्र को तबाह करने की थी. ब्रिटिशों और उनकी Propaganda Academy से निकले तथाकथित इतिहासकारों ने भारत के झूठे इतिहास का ना ही मात्र प्रसार किया बल्कि उनके काल निर्धारण पर भी कभी शायद ही प्रश्न उठाया हो.


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भारत में वैदिक काल जैसा अतीत में कोई स्पेशल काल नहीं था जैसा कि हम अपनी इतिहास की किताबों में पढ़ते हैं. वैदिक सभ्यता को किसी एक काल या सदी में नहीं समेटा जा सकता क्योंकि यह एक ऐसी सभ्यता है जिसकी कोई उम्र नहीं है, ये अनंत है.

ब्रिटिश Propagandist के लिखे इतिहास से इतर जाकर देखें तो हम पाते हैं कि, भारत में वैदिक काल जब ब्रिटिश आये तब भी था, आज भी है और आगे भी तब तक रहेगा जब तक धरती की एक बड़ी आबादी वैदिक मूल्यों पर अपना जीवन जीती रहेगी. आज हम दुनियाभर में वैदिक सभ्यता के प्रसार को प्रत्यक्ष देख सकते हैं.


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वर्तमान में हम जो भारतीय सभ्यता देख रहे हैं वह पश्चिम, मध्य एशिया और वैदिक सभ्यता का मिला जुला स्वरूप है. समय के साथ वैदिक सभ्यता का पालन करने वाले लोगों में बदलाव अवश्य आये और उन्होंने जीने का ढंग कई मायनों में बदल लिया है लेकिन वैदिक काल और उससे जुड़े लोगों को अतीत बना देना या उन्हें एक विशेष काल में समेट देना भारी ऐतिहासिक भूल है.

अब इसे सुधारने का समय है. वैदिक सभ्यता इतिहास नहीं है बल्कि वर्तमान एवं भविष्य है जिसका आगे भी निरंतर प्रसार होना है. इतिहास के कालानुक्रम को जबतक भारतीय परिप्रेक्ष्य में नहीं निर्धारित किया जाता तब तक भारत का सही इतिहास लोगों के सामने लाने की कल्पना करना भी गलत है.


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जिस इतिहास के कालानुक्रम में ही झोल हो अगर उसके इतिहास को आप सच्चा इतिहास मानकर बैठे हैं तो निश्चित ही आपको मंथन करने की आवश्यकता है. भारतीय इतिहास का एक गहरी साजिश के तहत कैसे कबाड़ा किया गया इसके बारे में हम आगे के लेखों में पाठकों को बताने का प्रयास करेंगे.

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