वैदिक काल में गौमांस भक्षण की Theory क्यों गढ़ी गयी?

ब्रिटिशों के खर्चे पर लिखे इतिहास की परतें अब धीरे-धीरे उधड़ने लगीं हैं. वैदिक काल में गौमांस भक्षण की जो काल्पनिक परिभाषा गढ़ी गयी उसका मुख्य कारण था एक और गढ़े गए झूठ को पुष्ट करना.

वैदिक काल में गौमांस भक्षण की Theory क्यों गढ़ी गयी?
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जिन लोगों को संस्कृत का ‘स’ भी नहीं पता वो लोग अक्सर ऐसे लेख लिखते देखे जा सकते हैं जिसके अनुसार वैदिक शास्त्रों में मांस भक्षण का उल्लेख है. कुछ वामपंथियों एवं तथाकथित दलित उद्धारकों ने इससे एक कदम आगे बढ़कर लिखा है कि, वैदिक काल में ब्राह्मण भी गौमांस खाते थे और इसका जिक्र वैदिक शास्त्रों में है.

हालाँकि जब हम देखते हैं कि, उनके ऐसे मनगढ़ंत तथ्यों का स्रोत क्या है तब हम पाते हैं कि, उनका स्रोत वैदिक शास्त्र नहीं बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा British Narratives में लिखवाई गयी पुस्तकें थीं. इस विषय पर कुछ वेबसाइट्स पर लिखे गए जब कुछ लेख तलाशे गए तो उन्होंने मनुस्मृति का उदाहरण देकर वैदिक काल में गौमांस खाये जाने की बात की है.

मांस भक्षण पर वैदिक शास्त्र क्या कहते हैं?

वास्तविकता में मनुस्मृति या किसी वैदिक साहित्य में ऐसा कुछ नहीं है जैसा आरोप गौमांस खाने को लेकर वैदिक कालीन आर्यों पर लगाया जाता हैं. वैदिक शास्त्र मांस भक्षण के बारे में क्या कहते हैं, उदाहरण के लिए हम मनुस्मृति का निम्न श्लोक देख सकते हैं:

अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।
संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः ॥ ५१ ॥
(मनुस्मृति)

जो मांस के लिए जानवरों को मारते हैं, सिर्फ वही नहीं बल्कि जो उसे खरीदते हैं, पकाते हैं, परोसते हैं, खाते हैं वो सभी हत्यारे हैं ||

anumantā viśasitā nihantā krayavikrayī |
saṃskartā copahartā ca khādakaśceti ghātakāḥ || 51 ||
(Manusmriti)

Not only those who kill animals for meat but also those who buy, cook, serve, eat, must be seen as killing the animal—(51)

अगर आपने इतिहास की किताबें पढ़ी होंगी तो ये अवश्य पढ़ा होगा कि, वैदिक काल में गौमांस खाने की परंपरा थी. ये सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि वे इतिहास की किताबें जो अमेरिका एवं यूरोप के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं उसमें भी प्रमुखता से ये बताने पर जोर दिया जाता है कि, वैदिक काल में गौमांस भक्षण भारत में आम था. भारतीय इतिहास को लेकर हुए इस खेल के पीछे कई प्रमुख कारण थे.

वैदिक लोगों के गौमांस भक्षण की Theory क्यों गढ़ी गयी?

वैदिक काल में मांस भक्षण की जो काल्पनिक परिभाषा गढ़ी गयी उसका मुख्य कारण था एक और गढ़े गए झूठ को पुष्ट करना. भारत में निवास करने वाले आर्य बाहर से आये थे, इस तथ्य को तभी सही ठहराया जा सकता है जब आर्यों को गौमांस खाने वाला या मांसभक्षी सिद्ध किया जाय.


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भौगोलिक आधार पर जिस जगह से आर्यों का आगमन बताया जाता है वहां मांस भक्षण के बिना जीवन असंभव है. इसलिए आर्यों को बाहर से आया हुआ बताने के बाद उन्हें मांस भक्षी ठहराने की साजिशें शुरू हुयीं. ब्रिटिशों द्वारा भाड़े पर रखे Propagandists ने उनका हर काम बखूबी किया जिससे भारतीय इतिहास की दशा और दिशा बदली जा सके.

वैदिक सभ्यता एक विकसित और प्रगतिशील सभ्यता थी जिसने फसलों एवं फलों के उत्पादन से लेकर दुग्ध उत्पादों तक पर महारत हासिल कर ली थी. प्राचीन काल से ही भारत में दुग्ध उत्पाद प्रमुख खाद्य पदार्थों में आते थे. दूध-घी की नदियाँ बहने वाले किस्से इसी आधार पर बने थे. यही कारण है कि, गाय को भारतीय समाज में ऊँचा स्थान प्रदान किया गया.

अगर आपने ब्रिटिशों एवं वामपंथियों द्वारा लिखी इतिहास की किताबों या फिर मिशनरियों द्वारा काम पर रखे गये तथाकथित दलित उद्धारकों के साहित्य में कहीं ये पढ़ा था कि, वैदिक काल में गौमांस खाया जाता था या आर्य बाहर से आये थे तो आपको वैदिक ग्रंथों में क्या लिखा है ये भी पढ़ने की आवश्यकता है.

ब्रिटिशों का एजेंडा आगे बढ़ा रहे वामपंथी एवं दलित चिंतक

वैदिक शास्त्रों में जानवरों को अपने भोजन के लिए उपयोग करना तुच्छ कार्य माना जाता था. वैदिक साहित्यों में मौजूद ऐसे नियम-कानूनों से ब्रिटिशों और भारत के वामपंथी इतिहासकारों द्वारा गढ़ी वो कहानी भी फेल हो जाती है जिसकी वजह से वो आर्यों को बाहर से आया हुआ बताते हैं.

ऐसे तथ्य गढ़ने के पीछे ब्रिटिशों का सिर्फ एक मकसद था कि, किसी भी तरह भारतीयों को बाहरी आक्रमणकारी साबित किया जाय. ब्रिटिशों के इसी काम को आज भारत के वामपंथी और तथाकथित दलित चिंतक आगे बढ़ा रहे हैं.


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कब तक विद्यालयों का हिस्सा रहेंगी British Propagandist की लिखी किताबें?

इतिहास की किताबों में एकतरफ आर्यों के भारत पर काल्पनिक आक्रमण का जिक्र किया हुआ तो दूसरी तरफ ऐसे मनगढ़ंत तथ्यों का जिनका कोई ओर-छोर नहीं है. ब्रिटिशों द्वारा भाड़े पर रखे गये Propagandist ने ब्रिटिशों के Narratives के हिसाब से जो किताबें लिखीं वो आज भारतीय विद्यालयों का हिस्सा हैं.

उन किताबों को पढ़कर शिक्षित हुए लोगों ने जब किताबों लिखीं और शोध किया तो उसका स्रोत वही था जिसका प्रचार ब्रिटेन ने किया था. वेदों और आर्य ग्रंथों को लेकर अमेरिका-यूरोप में आज भी जितने साहित्य लिखे जाते हैं उनका स्रोत मैक्समूलर जैसे Propagandist द्वारा लिखी गयी किताबें होती हैं.

संस्कृत का ज्ञान नहीं और वैदिक शास्त्रों पर लेखनी

बहुत सारे इतिहासकार ऐसे ही हैं जिन्हें ना ही संस्कृत भाषा का ज्ञान है और ना ही उन्होंने कभी कोई शास्त्र पढ़ा है लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा साजिशन लिखवाई गयी किताबों के आधार पर लेख लिखकर वो खुद को भारतीय शास्त्रों का ज्ञाता समझते हैं.


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कम ही लोग इस तथ्य से परीचित होंगे कि, मैक्समूलर को यूरोप के बुद्धिजीवी वर्ग में उसके ऐसे कार्यों के चलते कभी सम्मान नहीं मिला. बल्कि यूरोप में खिंचाई होने के बाद मैक्समूलर ने खुद भी यी बात स्वीकार की थी कि, उसने ब्रिटिशों के लिए वैदिक शास्त्रों की गलत व्याख्या की थी.

अगर किसी को मांस भक्षण प्रिय है तो ये उसका व्यक्तिगत मामला है लेकिन ऐसे उदाहरण देना जिनका कोई आधार ना हो और उन्हें इतिहास के तौर पर प्रस्तुत करना निश्चित ही बौद्धिक अतिवाद है. आर्य किसी विदेशी धरती से नहीं आये थे बल्कि सिंधु, रावी, सतलज एवं गंगा यमुना के किनारे ही विकसित हुए थे.

ब्रिटिशों के खर्चे पर लिखे इतिहास की परतें अब धीरे-धीरे उधड़ने लगीं हैं. अब वो समय आ गया है जब भारतीय इतिहास का पुनर्लेखन किया जाना चाहिए और इतिहास का सही पक्ष लोगों के समक्ष रखा जाना चाहिए.

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