ईसाईयों की देवदासी प्रथा यूरोप से भारत कैसे आई?

महान ग्रीक लेखक होमर की इलियड और ओडिसी जैसी महाकथाओं में देवदासियों का जिक्र कई स्थानों पर आता है. यूरोप में जब ईसाईयत का उदय हुआ तब देवदासी प्रथा और भी ज्यादा चलन में आयी.

ईसाईयों की देवदासी प्रथा यूरोप से भारत कैसे आई?

ब्रिटिश राज के दौरान भारत की गौरवशाली परंपरा को किस प्रकार से नीचा दिखाया जाय और जाहिल परंपराओं को भारत से जोड़कर कैसे उन्हें पिछड़ा एवं असभ्य घोषित किया जाए इसे लेकर भरसक प्रयास हुए.

जैसा कि, कहा जाता है झूठ की उम्र ज्यादा लंबी नहीं होती. ऐसे ही ब्रिटिशों द्वारा गढ़े काल्पनिक इतिहास के साथ है जिनकी परतें अब खुलने लगी हैं.

सती प्रथा पर लिखे गये अपने पिछले लेख में हमने बताया कैसे इतिहास लेखन के जरिये ब्रिटिश साम्राज्य यूरोप की Witch Burning को भारत ले आया, ऐसे ही ईसाईयों की देवदासी प्रथा को भी ब्रिटिश राज के दौरान ही भारत की परंपरा बनाया गया.

देवदासी प्रथा की जड़ें

देवदासी प्रथा का जन्म यूरोप में हुआ. ईसाई धर्म के जन्म के बाद देवदासी प्रथा ने यूरोप में तेजी से पैर पसारे लेकिन इसकी जड़ें ग्रीक सभ्यता से जुड़ी हैं.


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ग्रीक देवताओं की सेवा के लिए ग्रीक मन्दिरों में अनेकों देवदासियां हुआ करती थीं जो जीवन भर वर्जिन रहने का प्रण लेती थीं और मन्दिर परिसर को ही अपने निवास स्थल के रूप में चुनतीं थीं.

ग्रीक विद्वान होमर की ‘इलियड’ में देवदासी प्रथा के साक्ष्य

महान ग्रीक लेखक होमर की इलियड और ओडिसी जैसी महाकथाओं में आप देवदासियों का जिक्र कई जगहों पर देख सकते हैं. होमर की रचनाओं का केंद्र ग्रीक संस्कृति थी जिसमें ट्रॉय जैसे साम्राज्य का प्रमुखता से जिक्र है.

होमर की रचनाओं के प्रमुख नायक अकीलियस का संबंध एक देवदासी से दिखाया गया है. होमर की लिखी कथाओं पर बाद में भी कई रचनाएँ हुईं एवं सुपरहिट फिल्मों का भी निर्माण हुआ है.


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अगर आपको किताब पढ़ना बोरिंग लगता हो तो आप ट्रॉय नामक एक प्रसिद्ध हॉलीवुड फिल्म देख सकते हैं जिसमें ट्रॉय के राजा की बेटी को देवदासी के रूप में दिखाया गया है. ट्रॉय की पटकथा का आधार भी होमर द्वारा लिखी इलियड है.

ईसाईयों में देवदासी प्रथा

यूरोप में जब ईसाईयत का उदय हुआ तब देवदासी प्रथा और भी ज्यादा चलन में आ गयी हालांकि उन्हें ‘नन’ या ‘मदर’ का नाम दिया गया. ईसाईयों में ननों की अवधारणा ठीक वैसी ही है जैसा भारत की देवदासी प्रथा के बारे में अंग्रेजों द्वारा किस्सा गढ़ा गया.

चर्च में नन के रूप में सेवा देने वाली महिलाएं जीवन भर कुंवारी रहने की कसम खाती हैं और खुद को ईसा मसीह के प्रति समर्पित कर देती हैं. चर्च में सेवा देने वाली इन महिलाओं पर सख्त पाबंदियां होती हैं, जैसे वह कभी शादी नहीं कर सकतीं और कभी किसी के साथ संभोग नहीं कर सकतीं.


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हालाँकि यूरोप और अमेरिकन देशों से आनी वाली रिपोर्ट बताती हैं कि, चर्च में सेवा देने वाली इन महिलाओं की हालत बेहद दयनीय होती हैं. वह समाज से अलग रहकर जीवन जीने को अभिशप्त तो होती ही हैं साथ ही उनका शारीरिक शोषण भी चर्च में पादरियों द्वारा किया जाता है.

चर्च के इन अपराधों से भारत भी अछूता नहीं है. पिछले दिनों भारत में भी चर्च में पादरियों द्वारा नन के रूप में सेवा देने वाली महिलाओं का शोषण एक बड़ा मुद्दा रहा था.

कौन हैं कॉन्सीक्रेटेड वर्जिन्स (Consecrated Virgins)

ईसाईयों में देवदासी जैसा एक और Concept देखने को मिलता है ‘कॉन्सीक्रेटेड वर्जिन्स’ अर्थात् ‘प्रतिष्ठित कुंवारी’ लड़कियों का. Consecrated Virgins Concept भी ग्रीक कथाओं और ननों के Concept जैसा ही है.

कैथोलिक चर्च में यह उपमा उन महिलाओं को दी जाती है जो स्वयं को पत्नी के तौर पर जीसस को समर्पित कर देती हैं. कॉन्सीक्रेटेड वर्जिन बनने वाली महिलाएं विवाह के समय पहने जाने वाली सफ़ेद ड्रेस पहनती है.


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इसके साथ ही वह जीवन भर पवित्र रहने की क़समें खाती है और यह वचन लेती है कि वह कभी किसी के साथ संभोग नहीं करेंगी. इस प्रक्रिया के दौरान खुद को ईसा मसीह के लिए समर्पित करने वाली महिला एक अंगूठी भी पहनती है जो ईसा मसीह से उसके संबंध का प्रतीक मानी जाती है.

चर्च और यूरोप की इन्हीं बुराइयों को ढकने के लिए ब्रिटिश काल में ऐसे बहुत सारी परंपराए भारत पर थोपने की कोशिशें की गईं जिनका संबंध भारत से नहीं था.

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