पाकिस्तान के Blasphemy Law से भी खतरनाक भारत का SC/ST Act

इस्लामिक देशों में Blasphemy Law के अंतर्गत जब कोई फंसाया जाता है तब कम से कम पीड़ितों को पाकिस्तान और विश्व भर के मानवाधिकार संगठनों का समर्थन मिलता है लेकिन भारत में SC-ST Act लगने के बाद इसकी कोई गुंजाईश नहीं.

पाकिस्तान के Blasphemy Law से भी खतरनाक भारत का SC/ST Act
बाएं आसिया बीबी अपने बच्चों के साथ, दायें विष्णु तिवारी जेल से छूटने के बाद

इस्लामिक देशों का ईशनिंदा कानून अर्थात् Blasphemy Law एक ऐसा कानून है जिसका आरोप अगर किसी व्यक्ति पर एक बार लग जाय तो उसकी जान का दुश्मन ना ही मात्र कानून बल्कि खुद एक विशेष वर्ग भी बन जाता है.

ईशनिंदा का आरोप लगने के बाद बचना लगभग नामुमकिन सा हो जाता है जिसकी सजा सिर्फ मौत या आजीवन कारावास है. इस्लामिक देशों में बड़े पैमाने पर इस कानून का दुरूपयोग किया जाता है. पाकिस्तान इस कानून के दुरूपयोग के लिए कुख्यात है. पाकिस्तान के लाहौर से जुड़े कुख्यात आसिया बीबी केस से आप परिचित होंगे.

क्या था आसिया बीबी का मामला

आसिया बीबी इस्लामिक देश में रहने वाली एक ईसाई महिला थीं. गाँव की औरतों के साथ हुयी एक आपसी बहस के दौरान उन पर ईशनिंदा का आरोप लगा दिया गया जो कि वास्तव में आसिया ने किया ही नहीं था. कुछ दिन बाद आसिया के घर में पुलिस आ धमकी और उन्हें पैगंबर मोहम्मद का अपमान के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया.

गिरफ्तारी के बाद आसिया पर ईशनिंदा कानून के अंतर्गत मुक़दमा चला. सुनवाई के दौरान आसिया खुद को निर्दोष बताती रहीं, लेकिन 2010 में उन्हें मौत की सजा सुनाई गई. लगभग 9 साल आसिया ने जेल की कोठरी में उस जुर्म के लिए गुजारे जो उन्होंने कभी किया ही नहीं था.

आसिया बीबी के हक़ में लड़ाई लड़ने वाले पाकिस्तानी बिजनेसमैन और नेता सलमान तासीर की भी मात्र इसलिए हत्या कर दी गयी क्योंकि वो निर्दोष आसिया को सजा से बचाना चाहते थे.

आपसी लड़ाई या खुन्नस निकालने के लिए Blasphemy Law का दुरूपयोग

इस्लामिक देशों में इस्लाम या फिर पैगंबर के ख़िलाफ़ कुछ भी बोलने पर ईशनिंदा कानून के अंतर्गत आजीवन कैद या फिर मौत की सजा दी जाती है. लेकिन ज्यादातर बार ऐसा देखा गया है कि, ईशनिंदा के आरोप निजी खुन्नस निकालने के लिए लगाए जाते हैं. एक बार जिस किसी पर ईशनिंदा के आरोप लग जाते हैं तो उसका जीना हराम हो जाता है.

आसिया बीबी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि गाँव की औरतों से बहस करने की उन्हें इतनी बड़ी सजा मिलेगी. अंततः आसिया को 9 वर्पिष सजा भुगने के बाद 2019 पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया. बरी होने के बावजूद आसिया बीबी की जान के पाकिस्तानी दुश्मन बने हुए थे फलस्वरूप उन्हें जान बचाकर कनाडा में शरण लेनी पड़ी.

भारत का Blasphemy Law है SC/ST Act

अब आते हैं भारत के SC/ST Act पर, जो किसी भी प्रकार से इस्लामिक देशों के ईशनिंदा कानून (Blasphemy Law) से कम नहीं है. इसे हरिजन एक्ट नाम से भी जाना जाता है. एक बार जिस किसी पर ये एक्ट लग जाय उसकी जान का दुश्मन ना ही मात्र एक वर्ग विशेष बल्कि देश का कानून भी बन जाता है.

पाकिस्तान की आसिया बीबी की तरह ही भारत में हैं विष्णु तिवारी. विष्णु मात्र 17 वर्ष के थे जब उनपर हरिजन एक्ट का आरोप लगा और उनपर मुकदमा दर्ज किया गया. आसिया बीबी को नौ वर्ष जेल में गुजारने पड़े जिसके बाद वो आरोपमुक्त हो गईं लेकिन विष्णु उतने भाग्यशाली नहीं रहे. उन्हें 20 वर्ष जेल में गुजारने पड़े.

पशुओं को लेकर हुयी थी आपसी बहस

हरिजन एक्ट का आरोप लगने के बाद विष्णु की कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई. विष्णु कहते रहे कि वह 17 साल के हैं एवं बालिग नहीं है और न ही उन्होंने हरिजन एक्ट के अंतर्गत आने वाला ऐसा ऐसा कोई अपराध किया है, बस पशुओं को लेकर थोड़ी बहुत पीड़ित पक्ष से बहस हुई थी. लेकिन विष्णु की एक नहेने सूनी गयी.

पशुओं को लेकर हुयी इस आपसी लड़ाई में विपक्षी हरिजनों ने थाने में शिकायत दर्ज करा दी लेकिन मामला झूठा होने के चलते तीन दिन तक पुलिस ने मामला नहीं लिखा. बाद में दबाव के चलते पुलिस ने आखिरकार विष्णु पर रेप व SC-ST एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया. विष्णु को 16 सितंबर 2000 को गिरफ्तार किया गया.

विष्णु पर आरोप यह लगाया गया कि उसने गांव की एक महिला का उस समय रेप किया, जब वह घर से खेत में काम करने के लिए जा रही थी. पुलिस ने विष्णु तिवारी पर आईपीसी की धारा 376, 506 और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3 (1) (7), 3 (2) (5) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया.

साल 2003 में ललितपुर कोर्ट ने फैसला देते हुए विष्णु को 10 साल और एससी/एसटी एक्ट के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई. कोर्ट के आदेश के मुताबिक, दोनों सजाएं साथ-साथ चलनी थीं. इसी सजा के तहत विष्णु तिवारी पिछले 20 वर्षों से आगरा सेंट्रल जेल में सजा काट रहे थे.

20 वर्ष बाद मिला न्याय

अब 20 वर्ष बाद अंततः कोर्ट ने विष्णु को दोषमुक्त बताकर बरी कर दिया. विष्णु को उस जुर्म के लिए सजा मिली जो उन्होंने किया ही नहीं था. इन 20 वर्षों में विष्णु ने सिर्फ अपनी जवानी ही नहीं खोई बल्कि अपने माँ-बाप और दो भाई भी खोये, जिनकी विष्णु के कैदी जीवन के दौरान ही मृत्यु हो गयी.

विष्णु के मुकदमे के लिए उनके माँ-बाप और भाइयों ने जमीन भी बेच दी लेकिन उन्हें दोषमुक्त नहीं करवा पाए. संपत्ति के नाम पर विष्णु के पास अब बस एक खंडहर है जो कभी उनका घर हुआ करता था.

आसिया बीबी जितने भाग्यशाली नहीं रहे विष्णु तिवारी

आसिया बीबी को भले ही वर्षों प्रताड़ना मिली लेकिन इस बीच उनके लिए दुनिया भर में आवाजें उठाई गईं. अमेरिका-यूरोप के मानवाधिकार संगठनों से लेकर ईसाई समूहों ने आसिया के पक्ष में आवाज बुलंद की. पंजाब प्रांत के गवर्नर रहे सलमान तासीर ने भी आसिया का पक्ष लिया. लेकिन विष्णु तिवारी के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ.

विदेश की तो बात छोड़ो देश का भी कोई नेता विष्णु का पक्ष लेने नहीं आया. जो मानवाधिकार की बात करने वाले संगठन भी हैं भारत के SC-ST Act पर उनकी भी जुबान सिल जाती है.

Blasphemy Law की तरह SC-ST Act लगने के बाद न्यायपालिका का मूल सिद्धांत हो जाता है फेल

न्यायपालिका का मूल सिद्धांत है कि सौ गुनहगार भले छूट जाएं लेकिन एक बेगुनाह को सजा न हो. लेकिन ईशनिंदा कानून (Blasphemy law) की तरह अगर किसी पर SC-ST Act लग जाय तो न्यायपालिका का हर सिद्धांत फेल हो जाता है. जेल की काल कोठरी के सिवाय पीड़ितों के पास रहने को कोई जगह नहीं होती. उनके पीछे उनके परिवार जो यातना सहते हैं उसकी कोई गिनती नहीं होती.

विष्णु तिवारी मात्र एक उदाहरण भर है. भारत में ऐसे हजारों विष्णु तिवारी हैं जो उस जुर्म की सजा भुगत रहे हैं जो उन्होंने कभी किये ही नहीं है. कई राज्यों की पुलिस रिपोर्ट हो या फिर राज्यसभा में प्रस्तुत की गयी गृह मंत्रालय की रिपोर्ट सबने इसकी गवाही दी है.

SC-ST Act के मामले में न्यायपालिका का रवैया भी आमतौर पर रुखा ही रहा है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस काले कानून को रद्द कर न्यायपालिका की गलती सुधारने की कोशिश जरुर की थी. हालांकि देश के नेताओं की वजह से वह सफल नहीं हो पाई और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलट दिया.

Blasphemy Law की तरह खुन्नस में SC-ST Act का प्रयोग

पिछले वर्ष राजस्थान पुलिस ने भी बताया था कि, SC-ST Act के अंतर्गत दर्ज हुए अधिकतर मामले फर्जी थे. कुछ ऐसा ही गृह मंत्रालय ने राज्यसभा में बताया था कि SC-ST Act के अंतर्गत बहुत से लोग झूठे फंसाए जाते हैं.

अधिकतर मामलों में देखा जाता है कि, लोग आपसी लड़ाई, खुन्नस या सरकारी फायदे के लिए अपने विरोधियों के खिलाफ इस कानून का दुरूपयोग करते हैं.

भारत के लोकतांत्रिक देश होने पर प्रश्नचिन्ह लगाता है ये कानून

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों इस कानून की भयावहता देखते हुए ही इस कानून पर रोक लगा दी थी लेकिन राजनीतिक पार्टियों को इसमें अपना नुकसान नजर आया परिणामस्वरूप उन्होंने पुनः एक अध्यादेश पारित कर भारत पर फिर से एक ऐसा कानून लाद दिया जो भारत के लोकतांत्रिक देश होने पर प्रश्न चिन्ह उठाता है.

संसद से जो नया अध्यादेश पारित हुआ है उसमें फिर से बिना जांच के मुकदमा और गिरफ्तारी का प्रावधान है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इसपर रोक लगा रखी थी. सरकार में बैठी राजनीतिक पार्टियों ने अपने निहित स्वार्थों के लिए एक ऐसे कानून को बढ़ावा दिया जो भारत के संवैधानिक ढांचे पर चोट करता है.

क्या पाकिस्तान जैसा ही है भारत

भारतीय अक्सर पाकिस्तान एवं इस्लामिक देशों की मानवाधिकार के मुद्दों पर आलोचना करते हैं लेकिन वो उनकी आलोचना करते वक्त ये भूल जाते हैं कि, वो किसी भी मामले में इस्लामिक देशों से कम नहीं हैं. अगर उनके पास ईशनिंदा कानून है तो हमारे पास भी SC-ST Act है.

पाकिस्तान में Blasphemy Law के अंतर्गत जब कोई फंसाया जाता है तब कम से कम पीड़ितों को पाकिस्तान और विश्व भर के मानवाधिकार संगठनों का समर्थन मिलता है लेकिन भारत में SC-ST Act लगने के बाद इसकी गुंजाईश नहीं बचती. फ़िलहाल भारत के SC-ST Act को लेकर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कोई भी चर्चा देखने को नहीं मिली है.

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