समोसा ईरान से, जलेबी अरब से आई, जानें ये बकवास कहाँ से भारत आई

विकिपीडिया में लिखा है, फारसी बोलने वाले तुर्की आक्रमणकारी ईरान से इन पकवानों को भारत ले आये लेकिन जब तुर्की वालों से पूछो कि, उन्होंने भारत पर आक्रमण कब किया था तो वो खुद सर पकड़ कर बैठ जाते हैं कि ऐसा उन्होंने कब कर दिया.

समोसा ईरान से, जलेबी अरब से आई, जानें ये बकवास कहाँ से भारत आई
Image Source Asian Recipes

अगर आपने कहीं पढ़ा था कि, समोसा ईरान से, जलेबी अरब से और चाय इंग्लैंड से आयी थी तो ये लेख आपके लिए है. भारतीयों को हीनभावना ग्रस्त बनाने एवं उनकी जड़ों से काटने के लिए भारत की किताबों में ऐसे-ऐसे बकवास Narratives गढ़े गये जिनका कोई ओर-छोर नहीं था. आज वो झूठे Narratives भारतीय शिक्षा प्रणाली का हिस्सा हैं.

समोसा को ईरान से आया हुआ बताना और जलेबी को अरब से आया हुआ बताना भारत को ‘निल बटे सन्नाटा’ दिखाने के लिए ब्रिटिश एवं उनका बोझ ढो रहे वामी इतिहासकारों के उस एजेंडे का परिणाम था जिसके अंतर्गत वो यह साबित करना चाहते थे कि, भारतीयों में खाने-पीने और पकवान बनाने तक के गुड़ नहीं थे.

ये तथाकथित इतिहासकार ये गलती कभी ना करते अगर उनमें थोड़ा सा भी दिमाग होता या खुद के दिमाग से कुछ भी सोचने-विचारने की छमता होती या फिर उन्हें संस्कृत आती होती और उन्होंने कभी राजा नल की लिखी हुयी किताब ‘पाकदर्पण’ पढ़ी होती.

पाकदर्पण में 11 अध्याय एवं 760 श्लोक हैं जिनमें भारत के रसोईघरों में प्रयुक्त होने वाले पाकशास्त्र का वर्णन है. जब आप पाकदर्पण पढ़ेंगे तो आपको समोसा, जलेबी से लेकर आज के मोमोस तक का जिक्र मिल जायेगा.

पाक कला में अगर भारत को विश्व का पिता कहा जाय तो गलत नहीं होगा. जितने प्रकार के पकवान पूरे विश्व में नहीं मिलते उतने अकेले भारत के किसी भी एक प्रांत में मिल जायेंगे.

ये भी पढ़ें: यूरोप की Witch Burning कैसे बनी भारत में सती प्रथा?

वास्तविकता यह थी कि, जिन चीजों पर कभी अरब का तो कभी ईरान का लेबल चिपकाया गया उनमें से अधिकतर चीजें भारत से निकलकर अरब और ईरान पहुंची थीं. ऐसा नहीं है कि भारतीय पकवानों पर ये लेबल अरब या ईरान वालों ने खुद से चिपकाया, वो बेचारे तो खुद नहीं जानते कि, वो इतनी चीजें बनाते थे.

बल्कि ईरान और अरब में बहुत सारी चीजों को भारत से जोड़कर देखा जाता है. उदाहरण के लिए ईरान में चिप्स को ‘पोफाक हिन्दी’ तो पापड़ और नल्ली को ‘अजील हिन्दी’ कहा जाता है. ऐसे काजू को ईरानी लोग ‘बादाम हिन्दी’ बोलते हैं तो इमली को ‘तामरे हिन्द.’

ईरान और अरब देशों ने भारत को क्रेडिट देने में कोई कमी नहीं रखी है लेकिन फिर कहाँ से भारतीय किताबों में ये आ गया कि, समोसा ईरान से आया और जलेबी अरब से?

फारसी बोलने वाले तुर्की हमलावर ईरान से कब भारत आये?

विकिपीडिया में लिखा है कि, फारसी बोलने वाले तुर्की आक्रमणकारी ईरान से इन पकवानों को भारत ले आये लेकिन जब तुर्की वालों से पूछो कि, उन्होंने भारत पर आक्रमण कब किया था तो वो खुद सर पकड़ कर बैठ जाते हैं कि ऐसा उन्होंने कब कर दिया?

अगर हम थोड़ी और तह तक जाते हैं तो पाते हैं कि, फ़ारसी बोलने वाली ऐसी कोई तुर्क आबादी का ईरान में अस्तित्व ही नहीं है. ईरान के अजरबैजान प्रांत में अवश्य ऐसी आबादी रहती है जो तुर्क अजेरी बोलती है और वह खुद को तुर्की या ईरानी नहीं बल्कि अजरबैजानी कहलाया जाना पसंद करती है.

बस ईरान में समोसे को लोग संबोसे और जलेबी को जलेबिया बोलते हैं इसके लिए इन पकवानों को वहां से जोड़ दिया गया. हालाँकि ये मजाक किताबों में लिखते वक्त इसका ध्यान नहीं रखा गया कि, ये पकवान ईरान, अरब या तुर्की में इतने प्रसिद्ध नहीं जितने भारत में.

समोसा-जलेबी से आगे भी हैं मिलते जुलते नाम

अगर सिर्फ मिलते जुलते नाम के चलते ईरान और अरब को इन पकवानों का क्रेडिट दिया गया तो ‘सब्जी’ ‘हलवा’ और ‘बाजार’ जैसे शब्दों का क्रेडिट भी तुर्की, ईरान और अरब के देशों को देना चाहिए क्योंकि हमारे ये नाम भी उनसे मिलते जुलते हैं.

वो बात और है कि, सबसे ज्यादा सब्जियों के प्रकार भारत में पाए जाते हैं, हलवे में सबसे ज्यादा वैरायटी आपको भारत में मिलेगी और भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार भी है. शुक्र है भारत के इतिहासकारों ने ये नहीं गढ़ा कि, हलवा, सब्जी और बाजार भी भारत में ईरान एवं अरब से आया था.

ये भी पढ़ें: ईसाईयों की देवदासी प्रथा यूरोप से भारत कैसे आई?

वैसे ब्रिटिशों के आने से पहले ये बॉर्डर वगैरह का इतना झंझट नहीं था इसलिए चीजें बिना किसी देश का लेबल लगे आराम से इधर-उधर तैरती रहती थीं इसलिए किसी सामान या पकवान पर किसी देश का लेबल लगाने की हवस उस दौर में नहीं थी.

कब से शुरू हुआ ये ड्रामा

अलाना चीज ईरान से भारत आई, फलाना चीज तुर्की से, ढिमाका चीज अरब से ये ड्रामा ब्रिटिशों द्वारा भारत के इतिहास लेखन के दौरान उनकी शातिर साजिशों के बाद शुरू हुआ जिसका शिकार भारतीय उपमहाद्वीप की मासूम पढ़ी-लिखी जनता बनी.

खाने-पीने की चीजों और पकवानों पर अपना-अपना लेबल चिपकाने की शुरुआत भी यूरोप और अमेरिका की ही देन है. चाय का भारत में सदियों से पारंपरिक औषधि के रूप में प्रयोग होता आ रहा है. अंग्रेजों ने खुद चाय के औषधीय गुणों के बारे में भारतीयों से जाना.

तेल, चीनी, दुग्ध और खोये से बनने वाले पकवान जिनके सभी जरुरी सामान अरब में मिलने ही असंभव थे भारतीय इतिहासकारों ने उन्हें अरब और ईरान से जोड़ दिया. भारतीय इतिहासकारों के ऐसा करने का सिर्फ एक कारण था कि, उनके ईरानी और अरबी नाम मात्र भारतीय नामों से थोड़े मिलते जुलते थे.

ब्रिटिशों की शातिर साजिशों का परिणाम थे ऐसे Narratives

ईरान, अरब, तुर्की और अजरबैजान में बहुत सारे शब्द एवं पकवानों के नाम भारत से मिलते जुलते हैं. जिसका अर्थ कतई यह नहीं है कि, हर चीज वहीं भारत आयी हो जैसा कि भारत की इतिहास की किताबों में हमें देखने को मिलता है. भारत के धन से खुद को संपन्न बनाने वाले ब्रिटिशों ने भारत को कमतर दिखाने के लिए हर वह प्रयोग किये जो वो कर सकते थे.

ये भी पढ़ें: क्या भारतीय इतिहास पूरी तरह से झूठ पर टिका है?

अंग्रेजों के भारत आने के बाद फारसी एवं अरबी शब्दों को भारत में काफी बढ़ावा दिया गया. यहाँ तक कि, कानून की भाषा भी फ़ारसी ही रखी गयी. जिन भारत विरोधी विचारों को अंग्रेजों ने बढ़ावा दिया, उनकी एकेडमी से निकले भारत के तथाकथित भारतीय इतिहासकारों ने उसे ही आगे बढ़ाया.

गुरुकुलों को खत्म करके अंग्रेजों ने जो स्कूल प्रणाली चलाई उसके माध्यम से वही शिक्षा लोगों के दिमाग में डाली गयी जो भारतीयों को उनकी जड़ों से काटती हो और अपनी ही सभ्यता संस्कृति पर शर्मिंदा करती हो.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here