किसान बिल: क्या WTO में विकसित देशों की साजिशों का शिकार हुआ भारत?

WTO को लेकर विश्व में एक आम धारणा रही है कि, इस संगठन पर अमेरिका, कनाडा एवं यूरोप के विकसित देशों का दबाव रहता है जिसके चलते इस संगठन के नियम कानून भी उनकी सुविधा के अनुसार बनते-बिगड़ते रहते हैं.

क्या WTO के दबाव में किसान बिल लाई मोदी सरकार?

राजधानी दिल्ली में किसान बिल के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन ने जिस तरह की असमंजस की स्थिति सरकार के लिए उत्पन्न की है उसे लेकर लोगों के मन में कई प्रकार के प्रश्न उठ रहे हैं. मसलन,

  • क्या सरकार वास्तव में ये बिल किसानों की आय बढ़ाने के लिए लाई है?
  • क्या किसान बिल किसानों पर जबर्दस्ती थोपा जा रहा है?
  • सरकार किसानों के इतने लंबे प्रदर्शन के बावजूद भी बिल क्यों नहीं वापस ले रही?
  • जब किसान ही सरकार की योजनाओं से खुश नहीं हैं तो सरकार ये किसान बिल किनके लिए लाई है?
  • क्या WTO एवं कनाडा-अमेरिका जैसे विकसित देशों का सरकार पर किसान बिल को लागू करने का दबाव है?

किसान बिल पर चल रहे घटनाक्रम को समझने के लिए हमें World Trade Organization (WTO) में पिछले कुछ वर्षों में हुए घटनाक्रम समझने पड़ेंगे.

WTO की Committee on Agriculture (CoA)

WTO की कृषि विषयों पर एक समिति है Committee on Agriculture (CoA) जिसका काम सभी देशों की कृषि व्यवस्था को Review करना, कृषि व्यवस्था को लेकर नियम कानून बनाना और विभिन्न देशों के मध्य चलने वाले कृषि संबंधी विवादों का निपटारा करना है.

WTO को लेकर विश्व में एक आम धारणा रही है कि, इस संगठन पर अमेरिका, कनाडा एवं यूरोप के विकसित देशों का दबाव रहता है जिसके चलते इस संगठन के नियम कानून भी उनकी सुविधा के अनुसार बनते-बिगड़ते रहते हैं.

WTO की वेबसाइट पर मिली जानकारी के अनुसार, Committee on Agriculture की साल में तीन से चार बार बैठक होती है. जिसमें पिछले वर्षों में जितनी भी बार बैठक हुयी है लगभग हर बार विकसित देशों (खासकर अमेरिका, कनाडा और यूरोपीय यूनियन) में से किसी ना किसी ने भारत के कृषि कानूनों को लेकर सवाल उठाये हैं और WTO के जरिए भारत सरकार पर दबाव बनाया है कि वो किसानों को सरकारी सहायता देना जल्द से जल्द बंद करे.

WTO में भारत के खिलाफ शिकायतें

WTO में भारत के खिलाफ जो शिकायतें की गयी हैं उसमें मुख्य शिकायत है MSP अर्थात् Minimum support price, विकसित देश इसके सख्त खिलाफ हैं कि भारत अपने किसानों को MSP जैसी कोई सुविधा दे.

भारत की जिन अन्य योजनाओं पर WTO में शिकायत की गयी हैं वो हैं:

– PM-KISAN योजना
– PMFBY योजना
– लोन माफ़ी
– किसान सब्सिडी
– आसान किसान ऋण
– स्टॉक लिमिट

WTO और विकसित देशों का भारत पर दबाव

जो कनाडा आज भारतीय किसानों के विरोध प्रदर्शन को समर्थन देने का पाखंड कर रहा है उसी कनाडा ने 2017 से 2020 के बीच में भारत के खिलाफ WTO में 65 सवाल उठाये हैं, कनाडा ने WTO में भारत पर PM-KISAN और PMFBY योजना को भी बंद करने के लिए दबाव डाला है.

इसो तरह भारत के नए मित्र माने जाने वाले अमेरिका ने WTO की लगभग हर बैठक में भारत की सरकारी कृषि नीति पर सवाल उठाये हैं और भारत को किसानों की सहायता बंद करने के लिए दबाव बनाया है.

यही हाल यूरोपियन यूनियन (EU) का है, जिसने भारत सरकार द्वारा किसानों को दिए जाने वाले Easy Agricultural Loan और Subsidies पर सवाल उठाये हैं.

अच्छी बात यह है कि, भारत ने अभी तक इस वैश्विक दबाव के आगे घुटने नहीं टेके हैं, कनाडा, अमेरिका और यूरोपियन यूनियन को भारत की जिस योजना (MSP) से सबसे बड़ी समस्या है उसे सरकार ने जारी रखने का फैसला किया है.

भारत सरकार द्वारा लाया गया किसान बिल

भारत सरकार फ़िलहाल जो किसान बिल लेकर आई है उसमें से निम्न दो बिल:

1. कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक 2020

2. मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) अनुबंध विधेयक 2020

किसानों पर प्रत्यक्ष तौर पर कोई ख़ास प्रभाव नहीं डालते, क्योंकि इस बिल के प्रावधान के हिसाब से चलने या ना चलने के लिए किसानों को स्वतंत्रता दी गयी है. हालाँकि इस बिल से मंडी के आढ़तियों और बिचौलियों को नुकसान हो सकता है क्योंकि ये बिल पारित होने के बाद किसान मुक्त हो जायेंगे अपनी फसल किसी भी बाजार में बेचने के लिए.

अब आते हैं तीसरे बिल पर, जो है

3. आवश्यक वस्तु संशोधन बिल

आसान भाषा में कहें तो अब खाद्य तेल, तिलहन, दाल, प्याज और आलू जैसे कृषि उत्‍पादों पर पहले जो स्टॉक लिमिट लगाई गयी थी अब वो हटा दी गई है. WTO में अमेरिका, कनाडा और यूरोपीय यूनियन ने जिन कृषि योजनाओं पर सवाल उठाये थे उनमें से ये एक है.

सरकार द्वारा लाये गए तीन कृषि बिल में सिर्फ यही एक बिल है जिससे भारत को भविष्य में नुक्सान उठाना पड़ सकता है लेकिन किसानों का व्यक्तिगत रूप से इस बिल में भी कोई नुकसान नहीं है, वो उच्च कीमतों पर अपनी फसल किसी भी बाजार में बेचकर या विदेशों में निर्यात कर सकते हैं.

WTO और विकसित देशों के दबाव पर भारत का रुख

भारत सरकार द्वारा लाये गए किसान बिल का जब हम अध्ययन करते हैं तब इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि, सरकार बिल में फ़िलहाल ऐसा कोई नियम नहीं लेके आई है जिससे किसानों पर किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष दबाव पड़ता हो. फ़िलहाल तक मोदी सरकार ने WTO में विकसित देशों द्वारा की गयी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया है.

WTO के बारे में आम धारणा है कि, ये संगठन शुरू से ही कुछ विकसित देशों और उनकी कंपनियों द्वारा नियंत्रित है जो गरीब और विकासशील देशों पर मनमाने नियम कानून लादकर अपना हित साधते हैं.

यही कारण है कि कुछ विशेषज्ञ WTO को EAST INDIA COMPANY का वर्तमान स्वरूप बताते हैं. जिसके जरिये अप्रत्यक्ष रूप से पश्चिमी देश दुनिया पर आज भी वैसे ही अपना राज चला रहे हैं जैसे आज से 100 साल पहले प्रत्यक्ष रूप से चलाते थे.

किसान बिल के विरोधी और समर्थक

कृषि बिल को लेकर हमें सड़कों पर जो विरोध या समर्थन देखने को मिल रहा है उसमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिन्होंने अभी तक बिल पढ़ा या समझा ही नहीं है. जिन लोगों ने बिल पढ़ा या समझा भी है वो भी मात्र इसलिए इसका विरोध या समर्थन कर रहे हैं क्योंकि ये उनके एजेंडे में फिट बैठता है.

किसान बिल के विरोधियों में बड़ी संख्या उन लोगों की है जिन्हें मोदी सरकार के खिलाफ मुद्दों के तलाश रहती है चाहे उसका जरिया कोई भी हो वो बस अपनी विरोध तख्ती मौका देखते ही निकाल लेते हैं. बिल के विरोधियों में ऐसे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने पहले बिल का समर्थन किया था बाद में माहौल देखकर पाला बदल लिया.

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